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अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का दो दिवसीय भव्य आयोजन ।

अमनौर की धरती ने वह दृश्य देखा, जिसे वर्षों बाद भी भोजपुरी समाज गर्व के साथ याद करेगा। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का दो दिवसीय भव्य आयोजन

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का दो दिवसीय भव्य आयोजन ।

बिहार : अनूप नारायण सिंह ब्यूरो रिपोर्ट

महाकुंभ : डॉ. संजय प्रकाश मयूख ने नेतृत्व से रचा इतिहास

अमनौर की धरती ने वह दृश्य देखा, जिसे वर्षों बाद भी भोजपुरी समाज गर्व के साथ याद करेगा। अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का दो दिवसीय भव्य आयोजन बिहार के सारण जिले के अमनौर में हुआ और इस आयोजन की धुरी बने भाजपा के विधान परिषद सदस्य, पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और भोजपुरी भावना के सच्चे संवाहक डॉ. संजय प्रकाश मयूख।

अल्प समय में जिस दक्षता, सादगी, व्यापकता और गहरी सांस्कृतिक समझ के साथ उन्होंने इस सम्मेलन का संचालन किया, वह न सिर्फ प्रशंसनीय है, बल्कि आने वाले आयोजनों के लिए एक मानक भी बन गया।डॉ. मयूख के नेतृत्व में हुए इस सम्मेलन का उद्घाटन बिहार के गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने किया। उद्घाटन क्षण से लेकर समापन तक मंच पर बिहार सरकार के मंत्री, सांसद, विधायक, जनप्रतिनिधि और देश–विदेश के साहित्यकारों की उपस्थिति ने साबित किया कि यह आयोजन सिर्फ एक सांस्कृतिक समारोह नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता का उत्सव था।

भाजपा सांसद मनोज तिवारी और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गायिका कल्पना पटवारी जैसे दिग्गज कलाकारों की मौजूदगी ने समारोह को जन–जन तक पहुँचाने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई।लेकिन इस पूरे उत्सव का केंद्र जहाँ चमकते चेहरे थे, वहीं इसकी आत्मा वह व्यक्ति थे जिन पर यह पूरा विराट आयोजन टिका था—डॉ. संजय प्रकाश मयूख। यह सम्मेलन उनके सांस्कृतिक संस्कारों, पिता की साहित्यिक विरासत और भोजपुरी के प्रति उनके नैसर्गिक समर्पण की परिणति था।

उनके पिता भोजपुरी के प्रतिष्ठित साहित्यकार और राज्य के चर्चित शिक्षाविद रहे हैं। भोजपुरी साहित्य की गंध उनके संस्कारों में बचपन से बसती रही है। शायद इसी कारण जब उन्हें आयोजन समिति का नेतृत्व मिला, तो उन्होंने इसे किसी पद की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पिता की अधूरी पाती और भोजपुरी के प्रति अपना ऋण समझकर निभाया।

इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि दो दिनों तक अमनौर की फिज़ाओं में भोजपुरी की आत्मा गूंजती रही। एक मंच पर साहित्य, संगीत, कला, आलोचना, शोध और भविष्य की दिशा का गंभीर मंथन हुआ। इस मंथन को जनसहभागिता का ऐसा स्वर मिला कि अमनौर का मैदान सांस्कृतिक मेले की तरह खचाखच भरा रहा। यह भोजपुरी की लोकप्रियता का नहीं, बल्कि उसकी गहराई, व्यापकता और गंभीरता का प्रमाण था।डॉ. संजय मयूख ने यह साबित किया कि सच्चा नेतृत्व सिर्फ भीड़ जुटाने का नाम नहीं, बल्कि संस्कृति को सम्मान देने और समाज को जोड़ने का सामर्थ्य है।

उन्होंने न सिर्फ सम्मेलन को सफल बनाया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि भोजपुरी सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि एक समृद्ध भाषा, जीवंत संस्कृति और करोड़ों लोगों की पहचान है।अमनौर का यह आयोजन भोजपुरी इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर दर्ज हो गया है। और इसके केंद्र में एक ही नाम है—डॉ. संजय प्रकाश मयूख—जिन्होंने अपने नेतृत्व, संवेदना और संकल्प से भोजपुरी की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाई दी।

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