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रंगमंच एक कालकोठरी है, जो इसमें आता है निकल नहीं पाता

अधिवक्ता संघ भवन के हॉल में कला संगम द्वारा स्वदेश दीपक लिखित तथा सतीश कुन्दन निर्देशित नाटक ‘कालकोठरी’ का सफल मंचन किया गया।

रंगमंच एक कालकोठरी है, जो इसमें आता है निकल नहीं पाता

गिरिडीह, मनोज कुमार।

गिरिडीह : अधिवक्ता संघ भवन के हॉल में कला संगम द्वारा स्वदेश दीपक लिखित तथा सतीश कुन्दन निर्देशित नाटक ‘कालकोठरी’ का सफल मंचन किया गया। नाटक का डिज़ाइन नीतीश आनंद ने किया। सभी कलाकारों ने सशक्त और प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

नाटक का कथानक रंगमंच से जुड़े कलाकारों के जीवन संघर्ष पर आधारित है, जिसमें यह दिखाया गया है कि किस प्रकार कलाकार पारिवारिक दबाव, आर्थिक तंगी और व्यवस्था की उपेक्षा के बीच भी रंगमंच से जुड़े रहते हैं। नाटक संस्कृति विभाग के अधिकारियों की असंवेदनशीलता और लालफीताशाही को भी उजागर करता है।

रजत की भूमिका में नीतीश आनंद ने एक बेरोजगार लेकिन प्रतिभाशाली कलाकार का सजीव चित्रण किया। रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा न कर पाने के कारण पत्नी के ताने सुनता रजत जब नौकरी की तलाश में संस्कृति विभाग जाता है, तो वहां एक आईएएस अधिकारी की बेरुखी और अपमान का शिकार होता है। मीनाक्षी की भूमिका में सुजात कुमारी ने प्रभावशाली अभिनय कर खूब तालियां बटोरीं।

महेंद्र और बलवंत की दोहरी भूमिका में रविश आनंद ने अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। अंशिका आनंद ने लंगड़े बच्चे अंगद की भूमिका में अभावग्रस्त परिवार में पल रहे एक मासूम बच्चे की भावनाओं को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। भूखे बच्चे के सामने जब शोभा और कांता की दोहरी भूमिका निभा रहीं संस्कृति आनंद खाना लाती हैं, तो बच्चे की प्रतिक्रिया और पिता की डांट वाला दृश्य दर्शकों की आंखें नम कर गया।

रजत के पिता की भूमिका में शुभम कुमार ने एक संवेदनशील रिटायर्ड कर्मचारी का किरदार निभाया, जो अपने बेटे के तनाव को समझते हुए बहू को समझाते हैं कि बेरोजगारी ने रजत को चिड़चिड़ा बना दिया है, वह मूलतः अच्छा इंसान है।
संस्कृति विभाग के निदेशक की भूमिका में अनुराग सागर ने प्रभावी अभिनय के जरिए यह दर्शाया कि किस प्रकार कला की समझ से परे अधिकारी कलाकारों का अपमान करते हैं। वसुंधरा की भूमिका में अनुष्का सिन्हा ने नौकरी की तलाश में भटकती एक बेरोजगार कलाकार की पीड़ा को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया।

लेखक नवीन वर्मा की भूमिका में इंद्रजीत मिश्रा ने एक आदर्शवादी लेखक का चरित्र निभाया, जिनके दस नाटक लिखे जाने के बावजूद किसी का मंचन नहीं हुआ। निर्देशक बद्रीकौल की भूमिका में संदीप सिन्हा ने नाटक को जीवंतता प्रदान की। नाटक का सबसे भावनात्मक दृश्य तब आया जब नवीन वर्मा की पत्नी की भूमिका निभा रहीं अर्पिता अपने दिवंगत बच्चे की याद में फूट-फूट कर रो पड़ती हैं। दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनके अभिनय की सराहना की। नाटक में संगीत और प्रकाश संयोजन विकास रंजन का रहा।

कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन दीप प्रज्वलन के साथ कला संगम के संरक्षक राजेन्द्र बगडिया, उपाध्यक्ष कृष्ण कुमार सिन्हा, सचिव सतीश कुन्दन, संयोजक चुन्नूकांत, बिनय बक्शी, अरित चंद्रा, मदन मांझर्वे एवं राजीव रंजन ने संयुक्त रूप से किया।
चुन्नूकांत ने नाटक की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे केवल सतीश जी से मिलने आए थे, लेकिन नाटक देखकर बिना पूरा देखे जा नहीं सके। उन्होंने कलाकारों को उपहार व नकद देकर प्रोत्साहित किया। नकद प्रोत्साहन देने वालों में मनोज कुमार मुन्ना, राजीव रंजन, संजीव रंजन, सुनील भूषण, कृष्ण कुमार सिन्हा एवं बिनय बक्शी शामिल थे।

राजेन्द्र बगडिया ने कहा कि सभी कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से नाटक को जीवंत बना दिया और उन्होंने सभी कलाकारों को नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन उपाध्यक्ष कृष्णा बाबू ने किया।
कार्यक्रम में दर्शकों की उपस्थिति सराहनीय रही। इस अवसर पर कला संगम के संगीत प्रभारी अरित चंद्रा, राजीव रंजन, अजय शिवानी, अशोक गुप्ता, संजय सिन्हा, अजय वैशाखियार, धरणीधर, सिद्धांत, राजन बरनवाल, निवेश सिन्हा, आकाश रंजन, मीडिया प्रभारी सुनील मंथन शर्मा, अनुपम किशोर, स्वाति सिन्हा, अनुपमा सिन्हा, अंजली भूमी, अंजली सिन्हा, राजेश अभागा सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे।

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