जिला परिवहन कार्यालय में ‘दलाल राज’ के आरोप, जनता बेहाल
जिला परिवहन कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर अब शिकायतों और सवालों का दायरा लगातार बढ़ता नजर आ रहा है।

जिला परिवहन कार्यालय में ‘दलाल राज’ के आरोप, जनता बेहाल
हजारीबाग : जिला परिवहन कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर अब शिकायतों और सवालों का दायरा लगातार बढ़ता नजर आ रहा है। लाइसेंस, वाहन पंजीकरण, परमिट समेत विभिन्न परिवहन सेवाओं के लिए कार्यालय पहुंचने वाले लोगों का आरोप है कि उन्हें सामान्य प्रक्रिया से काम कराने में अनावश्यक परेशानियों और देरी का सामना करना पड़ता है, वहीं, कथित बिचौलियों की सक्रियता और पैसे लेकर काम कराने की शिकायतों ने परिवहन व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला महज फाइलों के लंबित रहने तक सीमित नहीं है आरोप यह भी है कि कार्यालय के आसपास कथित रूप से सक्रिय बिचौलियों के माध्यम से काम कराने पर प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान और तेज होने की धारणा आम लोगों में बन रही है। यदि यह स्थिति वास्तव में मौजूद है, तो यह सरकारी सेवा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।बड़कागांव क्षेत्र के हाईवा मालिक सुरेश साव ने आरोप लगाया कि सामान्य प्रक्रिया से अपना काम कराने के लिए उन्हें कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

उनका दावा है कि कथित बिचौलियों के माध्यम से काम कराने वाले लोगों की फाइलें अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ने की शिकायतें सुनने को मिलती हैं। इसी तरह कटकमसांडी क्षेत्र के वाहन मालिक नरेश यादव ने अपनी फाइल लंबे समय से लंबित रहने और बार-बार कार्यालय का चक्कर लगाने की बात कही है। वाहन मालिकों की ऐसी शिकायतें यदि लगातार सामने आ रही हैं, तो इनके पीछे की वास्तविक स्थिति की जांच किया जाना आवश्यक हो जाता है। वहीं ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनने से नाराज़ राजीव कुमार ने कहा है कि वे लगातार कई महीनों से कार्यालय का चक्कर लगा रहे हैं लेकिन उनका लाइसेंस आज तक नहीं बन सका ।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब लाइसेंस, रजिस्ट्रेशन और परमिट जैसी सेवाओं के लिए निर्धारित सरकारी प्रक्रिया और शुल्क तय हैं, तो आम नागरिकों को कथित बिचौलियों का सहारा लेने की स्थिति क्यों बन रही है? क्या कार्यालय में बाहरी व्यक्तियों की गतिविधियों की नियमित निगरानी होती है? क्या आम लोगों को उनके आवेदन की स्थिति और लंबित रहने का स्पष्ट कारण बताया जाता है? क्या काम के लिए निर्धारित समय-सीमा का पालन हो रहा है? और यदि किसी स्तर पर पैसे की मांग की जा रही है, तो उसकी शिकायत दर्ज कराने और कार्रवाई की प्रभावी व्यवस्था क्या है?
इन सवालों का जवाब परिवहन विभाग और संबंधित अधिकारियों को देना होगा।फाइलें लंबित, तो जवाबदेही किसकी?परिवहन कार्यालय में किसी वाहन का पंजीकरण या परमिट महज कागजी प्रक्रिया नहीं है। व्यावसायिक वाहन मालिकों के लिए फाइल में देरी सीधे आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है। लाइसेंस अथवा अन्य जरूरी दस्तावेजों के निस्तारण में अनावश्यक विलंब आम नागरिकों के समय और धन दोनों पर असर डालता है।
ऐसे में प्रत्येक लंबित फाइल का कारण स्पष्ट होना चाहिए। आवेदन कब आया, किस स्तर पर लंबित है, किस अधिकारी या कर्मचारी के पास है और नियमानुसार उसके निस्तारण की समय-सीमा क्या है, इन सवालों की पारदर्शी जानकारी व्यवस्था का हिस्सा होनी चाहिए।परिवहन कार्यालय में कथित अवैध वसूली, बिचौलियों की सक्रियता और फाइलों को प्रभावित करने जैसे आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराना जांच के बिना उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायतों को केवल आरोप कहकर नजरअंदाज करना भी समाधान नहीं है। यदि शिकायतें वास्तविक हैं, तो जांच के जरिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए; और यदि आरोप निराधार हैं,
तो विभाग तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करे।जिला प्रशासन अथवा परिवहन विभाग को आवश्यकता हो तो परिवहन कार्यालय की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र जांच करानी चाहिए। लंबित फाइलों का रिकॉर्ड, आवेदन से निस्तारण तक का समय, निर्धारित शुल्क और वास्तविक भुगतान, कार्यालय परिसर में बाहरी व्यक्तियों की गतिविधियां तथा शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था की जांच से स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।श, जरूरत पड़ने पर अचानक निरीक्षण, रिकॉर्ड की जांच और शिकायतकर्ताओं के बयान भी लिए जा सकते हैं। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि समस्या प्रशासनिक लापरवाही की है, प्रक्रिया संबंधी बाधा की है या कहीं नियमों के विपरीत लेन-देन की कोई व्यवस्था चल रही है।
जनता को चाहिए दलाल नहीं, पारदर्शी व्यवस्थाजनता की अपेक्षा बेहद सीधी है, सरकारी कार्यालय में निर्धारित शुल्क देकर निर्धारित प्रक्रिया के तहत काम हो। किसी व्यक्ति को अपना काम कराने के लिए किसी कथित बिचौलिए पर निर्भर न रहना पड़े। परिवहन कार्यालय में यदि कोई कर्मचारी, अधिकारी अथवा बाहरी व्यक्ति नियमों के विपरीत पैसे की मांग करता है, तो शिकायत की जांच कर दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
वहीं, यदि फाइल किसी वैध प्रशासनिक कारण से लंबित है, तो आवेदक को उसका स्पष्ट कारण और अपेक्षित समय बताया जाना चाहिए, अब सवाल केवल ‘काम कितने दिन में होगा’ का नहीं, बल्कि यह है कि सरकारी व्यवस्था में काम कराने के लिए आम आदमी को किस दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ रही है। शिकायतों की निष्पक्ष जांच, फाइलों की पारदर्शी निगरानी और जिम्मेदारी तय होने से ही इन सवालों का वास्तविक जवाब सामने आ सकेगा, जनता का सवाल स्पष्ट है—परिवहन कार्यालय में सरकारी प्रक्रिया चलेगी या कथित बिचौलियों का प्रभाव? अब आरोपों पर पर्दा नहीं, जांच के जरिए सच सामने आने की जरूरत है।




