हजारीबाग-बगोदर फोरलेन परियोजना पर चली नितिन गडकरी की कैंची,टेंडर हुआ वापस
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के कड़े रुख के बाद इस पूरे प्रोजेक्ट पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की 'कैंची' चल गई है। लंबे समय से भूमि अधिग्रहण, मुआवजा वितरण और वन भूमि अनापत्ति (Forest Clearance) के पेंच में फंसी इस फोरलेन सड़क परियोजना के टेंडर को फिलहाल रद्द या ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

हजारीबाग-बगोदर फोरलेन परियोजना पर चली नितिन गडकरी की कैंची,टेंडर हुआ वापस
वन भूमि अनापत्ति और भूमि अधिग्रहण के पेंच में फंसा महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट, केंद्रीय मंत्रालय ने वापस लिया टेंडर
NH-100 के चौड़ीकरण का सपना टूटा; अब धूल और गड्ढों के सहारे ही सफर करने को मजबूर होंगे हजारीबाग और गिरिडीह के लोग
हजारीबाग ब्यूरो रिपोर्ट
झारखंड के हजारीबाग और गिरिडीह जिले को आपस में जोड़ने वाली सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में से एक ‘हजारीबाग-बगोदर फोरलेन परियोजना’ को लेकर बेहद बुरी खबर आ रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के कड़े रुख के बाद इस पूरे प्रोजेक्ट पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की ‘कैंची’ चल गई है। लंबे समय से भूमि अधिग्रहण, मुआवजा वितरण और वन भूमि अनापत्ति (Forest Clearance) के पेंच में फंसी इस फोरलेन सड़क परियोजना के टेंडर को फिलहाल रद्द या ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। इस फैसले से हजारीबाग और इसके आस-पास के लाखों लोगों को एक बड़ा झटका लगा है, जो सालों से इस मार्ग के सुगम होने का इंतजार कर रहे थे।

हजारीबाग-बगोदर मुख्य पथ की बदहाली से नहीं मिलेगी मुक्ति
राष्ट्रीय राजमार्ग 100 (NH-100) के अंतर्गत आने वाला हजारीबाग-बगोदर पथ इस इलाके की लाइफलाइन माना जाता है। इस मार्ग से रोजाना हजारों की संख्या में छोटी-बड़ी गाड़ियां, मालवाहक ट्रक और यात्री बसें गुजरती हैं। स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि फोरलेन परियोजना के धरातल पर उतरने से न केवल सफर का समय आधा हो जाएगा, बल्कि इलाके के व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को भी एक नई रफ्तार मिलेगी। लेकिन टेंडर प्रक्रिया पर रोक लगने और परियोजना के पुनर्गठन की खबरों ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
भूमि अधिग्रहण और प्रशासनिक सुस्ती बनी रोड़ा
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट को बहुत पहले ही हरी झंडी दे दी थी और इसके लिए भारी-भरकम बजट भी आवंटित किया गया था। लेकिन जमीनी स्तर पर झारखंड के स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के सुस्त रवैये के कारण योजना लगातार पिछड़ती चली गई। हजारीबाग से लेकर बगोदर के बीच कई अंचलों में रैयतों को भूमि का मुआवजा नहीं मिल सका, जिसके कारण जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होते रहे। वहीं, वन विभाग से मिलने वाली एनओसी (NOC) भी तय समय सीमा के भीतर नहीं मिल पाई। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की नीति साफ रही है कि जिन परियोजनाओं में 80 प्रतिशत से अधिक भूमि का अधिग्रहण पूरा नहीं होता, वहां टेंडर प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जाता। इसी नीति का शिकार अब यह महत्वपूर्ण पथ हो गया है।
गिरिडीह और जीटी रोड (NH-2) से कनेक्टिविटी का सपना अटका
हजारीबाग-बगोदर पथ केवल दो शहरों को ही नहीं जोड़ता, बल्कि यह हजारीबाग को सीधे ग्रैंड ट्रंक रोड (GT Road / NH-2) से जोड़ता है, जिससे कोलकाता और दिल्ली का सफर आसान होता है। बगोदर में जाकर यह मार्ग सीधे जीटी रोड में मिल जाता है। इस परियोजना के खटाई में पड़ने से अब गिरिडीह, बोकारो और धनबाद की ओर जाने वाले यात्रियों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। व्यापारिक दृष्टिकोण से भी इस मार्ग का चौड़ीकरण बेहद जरूरी माना जा रहा था। इस झटके के बाद अब स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी सवाल उठने लगे हैं कि आखिर उन्होंने समय रहते इस राष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट की बाधाओं को दूर कराने में रुचि क्यों नहीं दिखाई।
दिल्ली की हाई-प्रोफाइल बैठक में क्या हुआ? जानिए इनसाइड स्टोरी
इस परियोजना के भविष्य को लेकर हाल ही में देश की राजधानी नई दिल्ली में एक अत्यंत महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में मुख्य रूप से राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के शीर्ष अधिकारी, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के तकनीकी विशेषज्ञ, झारखंड सरकार के पथ निर्माण विभाग के वरीय सचिव और हजारीबाग व गिरिडीह जिले के प्रशासनिक प्रतिनिधि शामिल हुए थे।
इस बैठक के दौरान परियोजना की धीमी प्रगति और तकनीकी अड़चनों की समीक्षा की गई। बैठक में मौजूद अधिकारियों के बीच निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर चर्चा और निर्णय हुए:
॰ मंत्रालय का कड़ा रुख: केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अधिकारियों ने दो टूक शब्दों में कहा कि बगोदर-हजारीबाग पथ (NH-100) एक व्यस्त रूट है, लेकिन स्थानीय स्तर पर भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) में हो रही अत्यधिक देरी के कारण परियोजना की लागत लगातार बढ़ रही है।
॰ मुआवजा वितरण में विफलता: बैठक में यह बात सामने आई कि हजारीबाग और गिरिडीह जिला प्रशासन कई अंचलों में रैयतों के बीच मुआवजे की राशि का शत-प्रतिशत वितरण करने में विफल रहा। कई जगहों पर जमीन के मालिकाना हक को लेकर चल रहे अदालती विवादों के कारण एनएचएआई को काम शुरू करने के लिए ‘क्लियर साइट’ (विवाद रहित भूमि) नहीं मिल सकी।
॰ वन विभाग की एनओसी का पेंच: इस मार्ग का एक बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र से होकर गुजरता है। दिल्ली की बैठक में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि राज्य के वन विभाग की ओर से स्टेज-1 और स्टेज-2 की अनापत्ति (Forest Clearance) के लिए भेजे गए प्रस्तावों में कई तकनीकी कमियां थीं, जिन्हें समय रहते सुधारा नहीं गया।
॰ टेंडर वापस लेने का कारण: नितिन गडकरी के कड़े निर्देश हैं कि जब तक किसी भी नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट के लिए कम से कम 80 से 90 प्रतिशत जमीन का भौतिक कब्जा नहीं मिल जाता, तब तक निर्माण एजेंसी को टेंडर अलॉट नहीं किया जाएगा। दिल्ली की बैठक में जब यह स्पष्ट हो गया कि वर्तमान परिस्थितियों में काम शुरू करना संभव नहीं है, तब मंत्रालय ने इस परियोजना के मौजूदा टेंडर को वापस लेने (कैंसिल करने) का अंतिम फैसला सुना दिया।
अब आगे क्या?
दिल्ली की इस बैठक के बाद अब गेंद पूरी तरह से राज्य सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन के पाले में है। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे पहले रैयतों के साथ समन्वय बनाकर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को 100% पूरा करें और वन विभाग की बाधाओं को दूर करें। जब प्रशासन पूरी तरह से ‘विवाद मुक्त’ जमीन की रिपोर्ट सौंपेगा, तभी दिल्ली से इस फोरलेन परियोजना के लिए दोबारा नया टेंडर जारी करने पर विचार किया जाएगा।




