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12 साल की उम्र में छूटी पढ़ाई, 8 साल बाद फिर खोली किताबें; नाज़िया ने 10वीं में हासिल किए 81% अंक

बिहार के मुंगेर जिले के मिर्जापुर गांव की रहने वाली नाज़िया परबीन की कहानी उन युवतियों के लिए प्रेरणा है, जिनकी पढ़ाई आर्थिक परिस्थितियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण बीच में छूट जाती है। महज 12 साल की उम्र में स्कूल छोड़ने वाली नाज़िया ने करीब आठ साल के अंतराल के बाद दोबारा पढ़ाई शुरू की और अब बिहार मुक्त विद्यालयी शिक्षण एवं परीक्षा बोर्ड (BBOSE) से 10वीं की परीक्षा 81 प्रतिशत अंकों के साथ पास की है।

12 साल की उम्र में छूटी पढ़ाई, 8 साल बाद फिर खोली किताबें; नाज़िया ने 10वीं में हासिल किए 81% अंक

सिलाई और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच नाज़िया ने पूरा किया पढ़ाई का सपना, प्रगति कार्यक्रम ने दिखाई आगे बढ़ने की राह

मुंगेर, बिहार, अक्टूबर 2026 : बिहार के मुंगेर जिले के मिर्जापुर गांव की रहने वाली नाज़िया परबीन की कहानी उन युवतियों के लिए प्रेरणा है, जिनकी पढ़ाई आर्थिक परिस्थितियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण बीच में छूट जाती है। महज 12 साल की उम्र में स्कूल छोड़ने वाली नाज़िया ने करीब आठ साल के अंतराल के बाद दोबारा पढ़ाई शुरू की और अब बिहार मुक्त विद्यालयी शिक्षण एवं परीक्षा बोर्ड (BBOSE) से 10वीं की परीक्षा 81 प्रतिशत अंकों के साथ पास की है।

नाज़िया ने यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल की, जब उनके सामने पढ़ाई के साथ-साथ परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां भी थीं। उन्होंने सिलाई का काम करते हुए घर के खर्च में योगदान दिया और साथ ही अपनी पढ़ाई जारी रखी। उनकी इस यात्रा में एजुकेट गर्ल्स के प्रगति कार्यक्रम की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

परिवार की आर्थिक स्थिति ने 12 साल की उम्र में छुड़वा दी पढ़ाई

नाज़िया परबीन का जन्म 1 जनवरी 2005 को हुआ था। चार बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण परिवार की जिम्मेदारियां भी उनके कंधों पर थीं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने और परिवार में किसी अन्य कमाने वाले सदस्य के नहीं होने के कारण वर्ष 2017 में उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

पढ़ाई छूटने के बाद परिवार की आर्थिक मदद के लिए नाज़िया को बिहार से सैकड़ों किलोमीटर दूर पंजाब के लुधियाना जाना पड़ा। वहां उन्होंने एक फैक्टरी में काम किया और करीब 7 हजार रुपये प्रतिमाह कमाए। अपनी कमाई का लगभग पूरा हिस्सा वह माता-पिता और छोटी बहनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए घर भेज देती थीं।

गांव लौटीं तो मिला दोबारा पढ़ाई का मौका

नाज़िया की जिंदगी में बदलाव का अवसर उस समय आया, जब वह छुट्टी के दौरान अपने गांव वापस आई थीं। इसी दौरान उनके गांव में एजुकेट गर्ल्स का प्रगति कार्यक्रम शुरू हुआ था। गांव की सामुदायिक कार्यकर्ता यानी प्रेरक को नाज़िया की परिस्थितियों के बारे में जानकारी थी। उन्होंने नाज़िया के घर जाकर उनसे मुलाकात की और पढ़ाई दोबारा शुरू करने का विकल्प समझाया।

शुरुआत में नाज़िया ने पढ़ाई फिर से शुरू करने से इनकार कर दिया। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि परिवार की आर्थिक जरूरतें भी उन्हें ही पूरी करनी थीं। उन्हें चिंता थी कि अगर पढ़ाई शुरू की तो काम और घर की जिम्मेदारियों को कैसे संभाल पाएंगी।

नियमित स्कूल जाने की बाध्यता नहीं बनी, तो बदल गया फैसला

प्रेरक ने नाज़िया को बताया कि वह अपनी पारिवारिक और आर्थिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ प्रगति शिक्षण शिविर और मुक्त विद्यालय के माध्यम से 10वीं की तैयारी कर सकती हैं। इसके लिए उन्हें रोजाना नियमित स्कूल जाने की बाध्यता नहीं होगी और पढ़ाई पर अलग से आर्थिक बोझ भी नहीं पड़ेगा।

नाज़िया ने उस समय सिर्फ इतना कहा कि वह इस बारे में सोचकर बताएंगी। इसके बाद उन्होंने पूरी रात अपने भविष्य और परिवार की जरूरतों के बारे में विचार किया।

उन्हें पहले से सिलाई का काम आता था। उन्होंने तय किया कि लुधियाना में फैक्टरी की नौकरी करने के बजाय गांव में रहकर सिलाई का काम करेंगी। इससे वह परिवार की आर्थिक मदद भी कर पाएंगी और पढ़ाई के लिए समय भी निकाल सकेंगी। आखिरकार उन्होंने प्रेरक से कहा, “मैं कैम्प में पढ़ूँगी।”

सिलाई, घर का काम और पढ़ाई—तीनों को साथ लेकर चलीं

वर्ष 2025 में नाज़िया ने करीब आठ साल के अंतराल के बाद फिर से पढ़ाई शुरू की। उनकी दिनचर्या आसान नहीं थी। उन्हें कपड़े सिलने होते थे, परिवार के घरेलू काम संभालने होते थे और इसके साथ प्रगति शिक्षण शिविर में जाकर पढ़ाई भी करनी होती थी।

आर्थिक जरूरतों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच नाज़िया ने पढ़ाई के लिए नियमित रूप से समय निकालना शुरू किया। सिलाई उनके लिए सिर्फ आय का साधन नहीं रही, बल्कि इसी काम ने उन्हें पढ़ाई जारी रखने का अवसर भी दिया।

शादी की तारीख तय हुई, लेकिन नाज़िया ने पहले परीक्षा पूरी करने की बात कही

पढ़ाई के दौरान नाज़िया के परिवार में उनकी शादी की तैयारियां भी शुरू हो गईं। शादी की तारीख तक तय कर दी गई थी। हालांकि, नाज़िया ने अपनी पढ़ाई को बीच में छोड़ने से इनकार कर दिया।

उन्होंने साफ कहा कि वह पहले 10वीं की परीक्षा की तैयारी पूरी करना चाहती हैं और परीक्षा देने के बाद ही शादी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए। उनके होने वाले पति ने भी उनके फैसले को स्वीकार किया और पढ़ाई पूरी करने में उनका साथ दिया।

10वीं में 81 प्रतिशत अंक हासिल कर रचा नया अध्याय

लगातार मेहनत, प्रगति कार्यक्रम के सहयोग और अपनी जिम्मेदारियों के बीच पढ़ाई के लिए समय निकालने का परिणाम परीक्षा के नतीजों में दिखाई दिया। नाज़िया ने बिहार मुक्त विद्यालयी शिक्षण एवं परीक्षा बोर्ड (BBOSE) की 10वीं की परीक्षा में 81 प्रतिशत अंक हासिल किए।

उनकी सफलता के बाद परिवार में खुशी और गर्व का माहौल है। नाज़िया की उपलब्धि का असर उनकी छोटी बहनों पर भी पड़ा है। उन्हें भी अपनी पढ़ाई जारी रखने और भविष्य में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली है।

अब आगे की पढ़ाई और अच्छी नौकरी का सपना

10वीं की परीक्षा पास करने के बाद नाज़िया अब अपने भविष्य को लेकर नए सपने देख रही हैं। वह आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं और भविष्य में एक अच्छी नौकरी हासिल कर परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना चाहती हैं।

नाज़िया की कहानी बताती है कि आर्थिक परेशानियां, पारिवारिक जिम्मेदारियां और पढ़ाई के बीच लंबा अंतराल किसी व्यक्ति के शिक्षा के सपने को हमेशा के लिए खत्म नहीं करता। सही अवसर, सहयोग और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ दोबारा पढ़ाई शुरू की जा सकती है और लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

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