हुल दिवस पर करमजोड़ा में उमड़ा जनसैलाब सिदो-कान्हू को श्रद्धांजलि के बाद गुंजा वीरता के जयघोष l
हूल दिवस के अवसर पर मंगलवार को गिरिडीह जिले के बेंगाबाद स्थित करमजोड़ा में श्रद्धा, सम्मान और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला।

हुल दिवस पर करमजोड़ा में उमड़ा जनसैलाब सिदो-कान्हू को श्रद्धांजलि के बाद गुंजा वीरता के जयघोष
गिरिडीह : मनोज कुमार।
गिरिडीह : हूल दिवस के अवसर पर मंगलवार को गिरिडीह जिले के बेंगाबाद स्थित करमजोड़ा में श्रद्धा, सम्मान और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला। जिले के विभिन्न हिस्सों आये लोगों ने महान क्रांतिकारी वीर सिदो-कान्हू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। पूरे दिन करमजोड़ा में हूल दिवस को लेकर उत्सव जैसा माहौल रहा और लोगों ने उनके संघर्ष, बलिदान एवं आदर्शों को याद करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

सुबह से ही विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठनों के कार्यकर्ता करमजोड़ा स्थित सिदो-कान्हू चौक पर एकत्रित हुए। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच श्रद्धालुओं ने सिदो-कान्हू अमर रहें के जयघोष लगाए तथा पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी जितवाहन उरांव ने कहा कि सिदो-कान्हू ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हूल आंदोलन का नेतृत्व कर आदिवासी समाज ही नहीं, बल्कि पूरे देश को स्वतंत्रता संग्राम की नई दिशा दी थी।

जिला परिषद प्रतिनिधि जय प्रकाश मंडल ने कहा कि सिदो-कान्हू का जीवन संघर्ष, साहस और सामाजिक न्याय का प्रतीक है। उन्होंने युवाओं से उनके आदर्शों को अपनाने और समाज के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। चपूवाडीह मुखिया मो शमीम ने कहा कि सिद्धू कान्हू ने अन्याय, शोषण एवं ब्रिटिश शासन के विरुद्ध समाज को संगठित कर ऐतिहासिक हूल आंदोलन का नेतृत्व किया। उनका साहस, त्याग और बलिदान आज भी हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

हूल दिवस हमें अपने वीर शहीदों के संघर्ष, स्वाभिमान एवं राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है। सिद्धू कान्हू स्मृति पार्क के संस्थापक देवान बेसरा और अध्यक्ष आदित्य बेसरा ने संयुक्त रूप से कहा कि हुल क्रांति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का गौरवशाली अध्याय है। सिद्धू-कान्हू सहित हुल आंदोलन के वीर सेनानियों ने जल, जंगल और जमीन तथा स्वाभिमान की रक्षा के लिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष किया। उनका त्याग और बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। मौक़े पर मानवेंद्र मुर्मू, सुशील हंसदा, नुनुका टुडू, सीता मुनि किस्कु, सन्नी टुडू, सहित समाज के कई लोग मौजूद थे।


