सारण की सियासत में मंत्रिपरिषद का सूखा ,7 सीटें जीतकर भी एनडीए का कोई प्रतिनिधि नहीं, आखिर क्यों उपेक्षित है बिहार का यह निर्णायक जिला?
बिहार सारण की सियासत में मंत्रिपरिषद का सूखा ,7 सीटें जीतकर भी एनडीए का कोई प्रतिनिधि नहीं, आखिर क्यों उपेक्षित है बिहार का यह निर्णायक जिला?

सारण की सियासत में मंत्रिपरिषद का सूखा ,7 सीटें जीतकर भी एनडीए का कोई प्रतिनिधि नहीं, आखिर क्यों उपेक्षित है बिहार का यह निर्णायक जिला?
बिहार:अनूप नारायण सिंह ब्यूरो रिपोर्ट
बिहार : सारण की सियासत में मंत्रिपरिषद का सूखा ,7 सीटें जीतकर भी एनडीए का कोई प्रतिनिधि नहीं, आखिर क्यों उपेक्षित है बिहार का यह निर्णायक जिला?
बिहार की राजनीति में सारण जिला हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाता आया है—चाहे चुनावी समीकरण हो या नेतृत्व क्षमता। 2025 के विधानसभा परिणामों में भी सारण ने एनडीए को खुलकर समर्थन दिया और जिले की 10 विधानसभा सीटों में से 7 सीटें एनडीए के खाते में पहुंचाईं।

इनमें 5 बीजेपी और 2 जदयू की सीटें शामिल हैं। इसके बावजूद बिहार मंत्रिमंडल में सारण से एक भी प्रतिनिधि को स्थान न मिलना अपने आप में बड़ा राजनीतिक प्रश्न है।

सारण से एनडीए के पास इस बार ऐसे कई चेहरे हैं जिनका राजनीतिक कद और जनाधार मंत्रिमंडल में स्थान का पूरा पात्र है—बनियापुर के भाजपा विधायक केदारनाथ सिंह जिनका जीत का रिकॉर्ड मजबूत है और प्रभुनाथ सिंह परिवार से जुड़ाव भी; तरैया के जनक सिंह जो लगातार दूसरी बार विधायक बने और पिछली बार भी मंत्री पद से चूक गए; सोनपुर के विनय सिंह जो पार्टी के भरोसेमंद और अनुभवी चेहरे हैं;

माझी के रणधीर सिंह जो युवा नेतृत्व के साथ प्रभावशाली राजपूत प्रतिनिधित्व रखते हैं; एकमा के धूमल सिंह जो भूमिहार समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं; छपरा की पहली बार विधायक बनी छोटी कुमारी जिनकी साफ-सुथरी छवि और महिला नेतृत्व दोनों ही उन्हें मजबूत दावेदार बनाते हैं;

तथा अमनौर के मंटू सिंह पटेल जो तीसरी बार विधायक और पिछली सरकार में मंत्री रह चुके हैं। ऐसे प्रभावशाली दावेदारों की लंबी सूची के बावजूद सारण के हिस्से में शून्य आना चौंकाने वाला है।

जब सिवान से मंगल पांडे और गोपालगंज से सुनील कुमार को मंत्रिमंडल में स्थान मिला है और अब बरौली से जदयू विधायक मनजीत सिंह को राजपूत कोटे से शामिल किए जाने की चर्चा है, तब स्वाभाविक रूप से सारण में सवाल उठ रहा है कि क्या जिले का योगदान और राजनीतिक महत्व कम हो गया है? क्या 7 सीटें जीतकर भी सारण को महत्व न मिलना भेदभाव नहीं है? क्या जिले की जातीय विविधता—राजपूत, भूमिहार, कानू, महिला प्रतिनिधित्व—को अनदेखा किया जा रहा है?

महागठबंधन की पिछली सरकार में छपरा से दो मंत्री बनाए गए थे और तब सारण को सम्मान मिला था। इसके उलट एनडीए सरकार में अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं है और इससे जनता के बीच उपेक्षा की भावना गहराती जा रही है। राजनीतिक रूप से भी यह संदेश सही नहीं जाता, क्योंकि सारण सिर्फ एक जिला नहीं बल्कि बिहार की राजनीति का भावनात्मक और रणनीतिक केंद्र है।

अब नजरें आगामी मंत्रिमंडल विस्तार पर हैं, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न वही है—सारण से आखिर किसे मंत्री बनाया जाएगा और क्या इस बार भी सारण की अनदेखी होगी? सरकार को चाहिए कि सारण की राजनीतिक गरिमा और योगदान को सम्मान देते हुए मंत्रिमंडल में उसका न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे।सवाल अब भी पहले की तरह खड़ा है—जब सारण ने इतना दिया, तो बदले में उसे क्या मिला ?




