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“विकास जरूरी, लेकिन विस्थापन की कीमत पर नहीं”—दीपक भारती ने उठाई जल, जंगल और जमीन की आवाज

भाजपा गिरिडीह ग्रामीण के जिला कार्यालय मंत्री दीपक भारती ने झारखंड में विकास परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण और संभावित विस्थापन को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है।

“विकास जरूरी, लेकिन विस्थापन की कीमत पर नहीं”—दीपक भारती ने उठाई जल, जंगल और जमीन की आवाज

गिरिडीह, मनोज कुमार।

गिरिडीह : भाजपा गिरिडीह ग्रामीण के जिला कार्यालय मंत्री दीपक भारती ने झारखंड में विकास परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण और संभावित विस्थापन को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत गरीब, आदिवासी, मूलवासी और दलित परिवारों के विस्थापन के रूप में नहीं चुकाई जानी चाहिए।

दीपक भारती ने कहा कि झारखंड में जब भी बड़ी विकास परियोजनाएं आती हैं, तो अक्सर उन क्षेत्रों की जमीन पर नजर जाती है, जहां आदिवासी, मूलवासी और दलित परिवार पीढ़ियों से जल, जंगल और जमीन पर आधारित जीवन जीते आए हैं। उन्होंने कहा कि जंगल केवल जमीन का एक हिस्सा नहीं, बल्कि इन समुदायों के जीवन और आजीविका का आधार है।

महुआ, मशरूम, बेर और अन्य वन उपज से लेकर पशुओं के चारे तक, जंगल से मिलने वाले प्राकृतिक संसाधन ग्रामीण परिवारों की आजीविका से सीधे जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि पीढ़ियों से जंगलों के बीच रहने वाले समुदायों ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

दीपक भारती ने सवाल उठाया कि विकास परियोजनाओं के लिए बार-बार गरीब और कमजोर परिवारों की जमीन को ही प्राथमिकता क्यों दी जाए। क्या परियोजनाओं के लिए उपलब्ध सरकारी, बंजर अथवा गैर-आवासीय भूमि की संभावनाओं को पहले नहीं तलाशा जाना चाहिए?

उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान केवल खनिज संपदा से नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, संस्कृति, परंपरा और संघर्ष से भी है। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो जैसे महानायकों के संघर्ष का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि झारखंड की अस्मिता और अधिकारों की रक्षा की विरासत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दीपक भारती ने कहा कि राज्य में शहरों का विकास हो, रोजगार के अवसर बढ़ें और आधारभूत संरचना मजबूत हो, लेकिन विकास की प्रक्रिया में गरीब परिवारों की संस्कृति, आजीविका और पीढ़ियों से जुड़े अधिकारों का भी सम्मान होना चाहिए।
उन्होंने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की जरूरत बताते हुए कहा कि ऐसा विकास होना चाहिए जिसमें प्रकृति भी बचे, संस्कृति भी बचे और विकास भी हो।

उन्होंने कहा कि “विकास सबके लिए हो, विस्थापन केवल कमजोरों के हिस्से में न आए।” जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और अस्मिता की रक्षा के साथ होने वाला विकास ही वास्तविक और समावेशी विकास है।

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