मरांगबुरू संरक्षण को लेकर विवाद नवंबर क़े पहले सप्ताह में होने वाले धार्मिक सम्मेलनों पर मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी संगठन ने जताई आपत्ति सरकार की कार्यशेली पर उठाया सवाल
पारसनाथ पहाड़ पर आदिवासियों के पवित्र धार्मिक स्थल मरांगबुरू के संरक्षण को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी आदिवासी संगठन ने नवंबर में होने वाले धर्म सम्मेलन पर आपत्ति जताई है।

मरांगबुरू संरक्षण को लेकर विवाद नवंबर क़े पहले सप्ताह में होने वाले धार्मिक सम्मेलनों पर मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी संगठन ने जताई आपत्ति सरकार की कार्यशेली पर उठाया सवाल
गिरिडीह : मनोज कुमार।
गिरिडीह : पारसनाथ पहाड़ पर आदिवासियों के पवित्र धार्मिक स्थल मरांगबुरू के संरक्षण को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी आदिवासी संगठन ने नवंबर में होने वाले धर्म सम्मेलन पर आपत्ति जताई है। संगठन का कहना हेमंत सोरेन सरकार क़े ऐसे फैसलों में संताल समाज की धार्मिक भावनाओं और सामुदायिक हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

ना कि सरकार क़े अगुवा साथी समाज हित क़े विरोध में धर्म सम्मेलन का आयोजन करें. मारंग बुरु एक आस्था का केंद्र बिंदु है इस मामले में राजनीतिक नहीं होनी चाहिए. सरकार को चाहिए कि मारंग बुरु मामले में तुरंत ही अधूसूचना जारी कर देना चाहिए जिससे इनके स्वामित्व पर कोई भी सवाल खड़ा नहीं कर सके. बुधवार को मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी की जिला समिति ने गिरिडीह के एक स्थानीय होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मरांग बुरु पर्वत और आदिवासी संथाल समाज की पारंपरिक पूजा पद्धति से जुड़े मुद्दों को उठाया।
संगठन ने मरांग बुरु संघर्ष मोर्चा की गतिविधियों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि स्थानीय आदिवासी ग्रामीणों को विश्वास में लिए बिना धर्म सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। समिति ने पारंपरिक ग्राम सभा को सर्वोपरि मानते हुए
आदिवासियों की रीति-रिवाज और पूजा पद्धति को पूर्ववत बहाल रखने के लिए सरकारी अधिसूचना जारी करने की मांग की।
मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी संगठन संयुक्त सचिव अर्जुन हेमब्रम ने कहा कि आदिवासियों की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा पवित्र स्थल है। उन्होंने आरोप लगाया कि मरांगबुरू को बचाने की बात करने के साथ ही कुछ ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं, जो संताल समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 1911 में लंदन की प्रिवी काउंसिल ने संतालों के पक्ष में ‘रिकॉर्ड ऑफ राइट्स’ से जुड़ा फैसला दिया था।
उन्होंने हजारीबाग गजेटियर का भी उल्लेख करते हुए मरांगबुरू को संताल आदिवासियों का पवित्र स्थल बताया। उन्होंने कहा कि मरांगबुरू के संरक्षण और संताल समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शिता जरूरी है। ऐसे संवेदनशील मामलों में निर्णय लेते समय समुदाय की भावनाओं और व्यापक हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। प्रेस वार्ता में जिलाध्यक्ष नूनका टूद्दू, जिला उपाध्यक्ष बुधन हेमब्रम, भागु मरांडी, हेमलाल सोरेन, सानू हेमब्रम, अर्जुन हेमब्रम, सुशील मुर्म और रसिक लाल हेमब्रम मौजूद थे



