हजारीबाग़ में काले हीरे का काला खेल : रात के अंधेरे में धड़ल्ले से चल रहा अवैध कोयले का कारोबार
हजारीबाग़ में काले हीरे का काला खेल : रात के अंधेरे में धड़ल्ले से चल रहा अवैध कोयले का कारोबार

हजारीबाग़ में काले हीरे का काला खेल : रात के अंधेरे में धड़ल्ले से चल रहा अवैध कोयले का कारोबार
खबर 24 न्यूज नेटवर्क
रांची/हजारीबाग़: झारखंड के हजारीबाग जिले से एक बार फिर एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आ रही है। जिले के चरही थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले हत्यारी, 14 माईल, 15 माईल और इंदिरा-जरबा इलाकों में काले हीरे यानी कोयले का अवैध कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है। सूत्रों की मानें तो यह कारोबार न केवल स्थानीय स्तर पर मज़बूत नेटवर्क के सहारे चल रहा है, बल्कि इसके पीछे एक संगठित गिरोह की भी सक्रिय भूमिका मानी जा रही है।

रात के अंधेरे में होता है ‘खेल’
स्थानीय लोगों और गुप्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इन क्षेत्रों में हर रात करीब 10 बजे से सुबह 3 बजे तक ट्रैक्टरों और भारी ट्रकों के माध्यम से अवैध कोयले की ढुलाई की जाती है। यह कोयला इलाके के भीतर ही बने अस्थायी डंपिंग पॉइंट्स पर जमा किया जाता है, और फिर सुबह होते ही हाईवा के जरिए बाहर रवाना कर दिया जाता है।

बताया जा रहा है कि यह कोयला मुख्यतः चरही स्थित चितपुरनी प्लांट में डंप किया जाता है, जहाँ से इसे कोयला कानूनी आवरण ओढ़ाकर आगे भेजा जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार इस अवैध गतिविधि की जानकारी पुलिस और प्रशासन को गुप्त रूप से दी, लेकिन इसके बावजूद आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
पर्यावरण को भारी नुकसान, राजस्व का भी हो रहा नुकसान
इस अवैध कोयला खनन से न केवल पर्यावरणीय क्षति हो रही है, बल्कि सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व की भी हानि हो रही है। न तो सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है, न ही किसी प्रकार की परमिशन ली जा रही है। इससे न सिर्फ जंगल और मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है, बल्कि आसपास के जलस्रोत और लोगों की आजीविका भी प्रभावित हो रही है।
प्रशासन और नेताओं की निष्क्रियता पर सवाल

जब इस विषय पर हजारीबाग सदर विधायक प्रदीप प्रसाद से बात की गई तो उन्होंने माना कि उन्हें इस अवैध कारोबार की जानकारी है और उन्होंने इस संबंध में जिला प्रशासन को कई बार सूचना दी है। उन्होंने यह भी कहा कि हमने कई बार कार्रवाई की मांग की, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।

यह बयान इस ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी और स्थानीय राजनीतिक दबाव इस कारोबार को बढ़ावा दे रहे हैं।
क्या प्रशासन सो रहा है, या जानबूझकर आँख बंद किये हुए है?

सवाल यह है कि जब स्थानीय लोग रात में ट्रकों की आवाज सुनकर परेशान हो रहे हैं, जब ट्रैक्टर और डंपर धड़ल्ले से बिना रोक-टोक के आ-जा रहे हैं, तो प्रशासन को ये सब क्यों नहीं दिखता? क्या यह पूरी गतिविधि कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से संचालित हो रही है?
इस मामले में यदि गहन जांच की जाए तो राजस्व विभाग, खनन विभाग, वन विभाग और स्थानीय पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं। क्या यह सभी विभाग सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गए हैं? क्या यह काले हीरे का खेल अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव है?
हजारीबाग़ का यह अवैध कोयला कारोबार केवल एक स्थानीय अपराध नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का आईना है। जब तक जिम्मेदार विभाग और प्रशासनिक अधिकारी निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई नहीं करेंगे, तब तक यह ‘काला खेल’ यूं ही रात के अंधेरे में चलता रहेगा।

अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में क्या प्रशासन जागेगा या यह खबर भी अन्य मामलों की तरह धूल फांकती रह जाएगी।




