जेपी आंदोलन से विधायक तक का सफर, आज भी जनता के बीच सक्रिय हैं निर्भय शाहाबादी
गिरिडीह की राजनीति में कुछ ऐसे चेहरे हैं, जिनकी पहचान सिर्फ चुनावी जीत और हार तक सीमित नहीं है।

जेपी आंदोलन से विधायक तक का सफर, आज भी जनता के बीच सक्रिय हैं निर्भय शाहाबादी
दो बार बने गिरिडीह के विधायक, 2024 में महज 3838 वोटों से मिली हार के बाद भी जारी है जनसेवा
गिरिडीह : मनोज कुमार।
गिरिडीह : गिरिडीह की राजनीति में कुछ ऐसे चेहरे हैं, जिनकी पहचान सिर्फ चुनावी जीत और हार तक सीमित नहीं है। इन्हीं में एक नाम है निर्भय कुमार शाहाबादी का। मृदुभाषी स्वभाव, सरल व्यवहार और जनता के बीच सक्रिय रहने की कार्यशैली के लिए पहचाने जाने वाले निर्भय शाहाबादी दो बार गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शुमार शाहाबादी आज भी अपने आवासीय कार्यालय में लोगों से मिलकर उनकी समस्याएं सुनते हैं।

1974 के जेपी आंदोलन से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
निर्भय शाहाबादी का राजनीतिक सफर छात्र आंदोलन से शुरू हुआ। वर्ष 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले जेपी आंदोलन से जुड़ने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 1980 के दशक में वे लालू प्रसाद यादव से जुड़े। 1990 के दशक में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और दूसरे स्थान पर रहे। हालांकि, उस चुनाव में उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन गिरिडीह की राजनीति में उनकी सक्रियता बनी रही।

2009 में पहली बार बने विधायक
निर्भय शाहाबादी के राजनीतिक सफर में वर्ष 2009 निर्णायक साबित हुआ। उन्होंने बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाली झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) का दामन थामा और गिरिडीह विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर पहली बार विधायक बने। इस जीत के साथ ही उन्होंने क्षेत्र की राजनीति में अपनी अलग पहचान स्थापित की।
इसके बाद वर्ष 2013 में जेवीएम के भाजपा में विलय के साथ वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन पर भरोसा जताया। शाहाबादी ने इस चुनाव में जीत दर्ज की और दूसरी बार गिरिडीह के सदर विधायक बने।

2019 में हार, लेकिन जनता से नहीं टूटा संपर्क
वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में निर्भय शाहाबादी को झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी स्वर्गीय सुदिव्य कुमार सोनू से हार का सामना करना पड़ा। चुनावी हार के बावजूद उन्होंने क्षेत्र में अपनी सक्रियता बनाए रखी। जनता के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनना और स्थानीय मुद्दों को उठाना उनकी राजनीतिक गतिविधियों का हिस्सा बना रहा।
2024 में आखिरी दो राउंड में पलट गया चुनावी परिणाम
वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर निर्भय शाहाबादी पर भरोसा जताया और उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में मुकाबला बेहद करीबी रहा। मतगणना के दौरान शुरुआती 17 राउंड तक बढ़त बनाए रखने के बाद भी शाहाबादी को अंतिम दो राउंड में पिछड़ने के कारण हार का सामना करना पड़ा। वे महज 3,838 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए।
इस करीबी मुकाबले ने गिरिडीह विधानसभा चुनाव के परिणाम को चर्चा का विषय बना दिया। हालांकि, चुनाव में हार के बाद भी शाहाबादी की राजनीतिक गतिविधियां थमी नहीं।
आज भी आवासीय कार्यालय में सुनते हैं जनता की समस्याएं
निर्भय शाहाबादी की मौजूदा कार्यशैली की बात करें तो वे आज भी अपने आवासीय कार्यालय में नियमित रूप से बैठते हैं। यहां गिरिडीह और आसपास के क्षेत्रों से लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते हैं। लोगों से मुलाकात कर उनकी शिकायतें सुनना और यथासंभव समाधान के लिए पहल करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बना हुआ है।
सड़क, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और जनसुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर विधायक के रूप में उनकी भूमिका भी उनके राजनीतिक सफर का अहम हिस्सा रही है।
जीत-हार से आगे जनता के बीच सक्रियता
निर्भय शाहाबादी का राजनीतिक सफर जेपी आंदोलन से शुरू होकर विधानसभा तक पहुंचा। दो बार विधायक बनने, चुनावी हार का सामना करने और फिर भी जनता के बीच सक्रिय रहने तक की उनकी यात्रा गिरिडीह की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
2024 के चुनाव में मिली करीबी हार के बाद भी उनका आवासीय कार्यालय लोगों के लिए संवाद का एक केंद्र बना हुआ है। ऐसे में गिरिडीह की राजनीति में निर्भय शाहाबादी की पहचान एक पूर्व विधायक के साथ-साथ क्षेत्र में सक्रिय रहने वाले राजनीतिक चेहरे के रूप में भी बनी हुई है।




